माया इण्डिया
Saturday, November 05, 2005
Friday, September 23, 2005
सितम्बर-2005
माया इण्डिया
इलैक्ट्रानिक प्रिंट मीडिया के इस दौर में एक और हिन्दी पत्रिका का पदार्पण विस्मय करने के लिए पर्याप्त है। लेकिन प्रवेशांक से अगस्त तक के अंकों ने इसकी वैचारिक पृष्ठभूमि, इसकी यथार्थता और वर्तमान में इसके औचित्य को स्वत: ही स्पष्ट कर दिया है।
व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा की दौड़ में कई पत्रिकाएँ अपने कलेवरों अपनी तथाकथित पाठ्य सामग्री/स्तम्भों/अश्लील चित्रों के माध्यम से बाजार में न केवल अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में कामयाब दिखती हैं बल्कि कुछ भीड़ भी अपने ईद-गिर्द जुटा ही लेती हैं, भले ही थोड़े समय के लिए ही सही। यह बात और है कि भीड़ जुटाने की मानसिकता मदारियों की होती है प्रबुद्धों की नहीं। ऐसी पत्रिकाएँ सफर समाप्ति के बाद या तो ट्रेन में ही छोड़ दी जाती हैं या कुछ समय यह बैडरूम में गद्दों के नीचे जगह पा जाती हैं। माया इण्डिया इस तामझाम से अछूती है इसके लिए यह धन्यवाद की पात्रता रखती है।
अपनी तरफ से ......... में श्री प्रताप सिंह की हिन्दी की दुर्दशा पर कई व्यथा केवल प्रबुद्ध वर्ग तक ही सीमित नहीं है, बल्कि आम जन मानस भी इस पीड़ा को लम्बे समय से महसूस कर रहा है। देखा जाये तो हम हिन्दी की दुर्दशा का रोना और अंग्रेजी भाषा का विरोध इन पखवाड़ों में कुछ ज्यादा ही करते हैं, जो ठीक नहीं है। मुझे याद है कि आतंकवाद के बढ़ते प्रसार पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए व्रिटेन की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती मारग्रेट थैचर ने कहा था- ''ऐसे विषयों पर अनावश्यक बहस ही इनके प्रचार-प्रसार में सहायक होती है।`` हिन्दी के गौरव को कायम रखना है तो हमें भाषा द्वेष और क्षेत्रीयता के सीमित दायरे से बाहर आना ही होगा। साथ ही इन पखवाड़ों पर हिन्दी की दुर्दशा पर रोने की प्रवृत्ति छोड़ सकारात्मक सोच पैदा करनी होगी।
'बरकरार है जादू` में शोभा ठाकुर ने बहुत ही अच्छे ढँग से हिन्दुस्तान की इस गौरव और मिथक बन चुकी स्वर सामाज्ञी लता मंगेशकर के कई अनछुए पहलुओं को सामने रखा है। लगता तो यही है कि ईश्वर अपनी इस इकलौती अनूठी कृति को दुहराना नहीं चाहता। लता की जितनी लोकप्रियता चालीस के दशक में थी उससे कहीं ज्यादा आज है।
'तस्वीरें बोलती हैं` की नयनाभिराम तस्वीरें अपनी सजीवता, सरलता और चित्र विन्यास के कारण हृदय पर अपना अलग ही प्रभाव छोड़ती है। 'अन्दाज़े वयां` की गज़लें भी दिल के किसी केने को अनायास ही गुदगुदा देती हैं। 'तिरछे तीर` में शरद जोशी का व्यंग्य हमारे व्यावसायिक जीवन सम्बंधों पर करारी चोट करता है। 'सिनेमा सिनेमा` स्तम्भ माया नगरी की वास्तविकता और वर्तमान प्रसंगों को बखूवी जागर करते हैं।
माया इण्डिया ने कुल मिलाकर अपने सर्वग्राही स्तम्भों के साथ एक अच्छी शुरुआत की है। यह सिलसिला आगे भी कायम रहेगा और पत्रिका पाठकों के बीच अपनी अमिट छवि बनाने में सफल होगी। आशा है हमारा यह विश्वास अक्षुण्ण रहेगा।
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-राजेश सिंह
लाइब्रेरियन
केन्द्रीय विद्यालय प्र.का.का.होशंगाबाद (म.प्र.)
-राजेश सिंह
लाइब्रेरियन
केन्द्रीय विद्यालय प्र.का.का.होशंगाबाद (म.प्र.)
Wednesday, August 24, 2005
अगस्त-2005
माया इंडिया का अगस्त-2005 अंक मेरे सामने है। यह अंक प्रवेशांक से भी ज्यादा निखरा हुआ है। ''अपनी तरफ से-----'' में प्रताप सिंह जी की यह टिप्पणी ''अश्लीलता की बढ़ती हुई महामारी हमारे समाज के लिए बहुत बड़ा मसला बन गई हैं'' -पत्रिका के भावी उद्देश्य को बहुत कुछ स्पष्ट कर देती है। क्योंकि अनेक ख्याति लब्ध पत्रिकाएँ अश्लीलता को नकारती तो हैं पर उदाहरणों के बहाने अप्रत्यक्ष रूप से ऐसे चित्र प्रस्तुत करती हैं कि अश्लीलता भी शर्म से पानी-पानी हो जाये। उदाहरण के लिए महिला खिलाड़ियों के ऐसे पोज़ जिनमें उनके अधोवस्त्र की झलक हो, कैमरामैन की आँखें संभवत: यही अवसर तलाशती रहती हैं। और पत्रिका के सड़क छाप पाठक इसी बहाने उसे खरीदते हैं। लेकिन यह पत्रिका के प्रसार बढ़ाने का एक अश्लीलता माध्यम ही माना जाएगा। माया इंडिया के इस अंक में संपदकीय(अपनी तरफ से) को पढ़कर बहुत उम्मीदें हैं।
लोक संस्कृति पर वंदना गुप्ता का लेख अच्छा लगा। स्वागत है मानसून में तो श्री दिनेश ठाकुर ने मौसम के बहाने समाज, राजनीति, शिक्षा और तमाम व्यावहारिक बिन्दुओं पर ललित शैली में जीवन्त टिप्पणी की है। ऐसे लेख पत्रिका के पाठकों पर अपनी स्थायी छाप छोड़ते हैं। अंदाजे वयां में गजलें बहुत खूबसूरत हैं। गज़लों के कठिन शब्दों के अर्थ भी साथ में देने से इन्हें समझना पाठक के लिए आसान हो गया है। यह एक अभिनव प्रयोग है। तिरछे तीर मे सूर्यकान्त नागर ने तमाम व्यावहारिक पहलुओं पर मीठी चुटकी ली है और कथ्य को प्रभावशाली बना दिया है। फुलवारी बाल पाठकों को भविष्य में और अच्छा बाल साहित्य उपलब्ध कराएगी। एक विनम्र सुझाव है कि फुलवारी मे एक कहानी या बाल उपन्यास का अंश और एक या दो बालगीत भी दें। बालगीत शताब्दी के चुने हुए बालगीत हो जिन्हें क्रमश: दिया जाए तो बाल साहित्य का उज्ज्वल रूप सामने आ सकेगा। पत्रिका का बहुत बड़ा आकर्षक उसके फोटो हैं। जिस प्रोफेशनल योग्यता से फोटो खीचें गए हैं और फिर जिस गम्भीरता से पत्रिका के लिए इनका चयन किया गया है वह दृष्टि बहुत मॅझी हुई है। बोलते हुए से चित्रों से पत्रिका सजीव हो उठी है।
कुल मिलाकर माया इंडिया का यह अंक बहुत अच्छा है, लेकिन अच्छाई की आखिरी सीमा नहीं होती इसलिए आगामी अंक और भी अच्छे आऍगे यही विश्वास है।
पत्रिका की साज-सज्जा, प्रस्तुति बेजोड़ है। जहाँ तक मेरी अपनी दृष्टि है इस समय माया इंडिया देश की हिन्दी पत्रिकाओं में सर्वश्रेष्ठ है। ऐसे सुन्दर अंक के लिए मैं माया इंडिया परिवार को हार्दिक बधाई प्रेषित कर रहा हूँ।
शेष फिर।
-डॉ० जगदीश व्योम
Thursday, June 02, 2005
हिन्दी की पत्रिकाएँ
हिन्दी की पत्रिकाएँ जिनमें आप अपनी रचनाएँ भेज सकते हैं-
पंजाब सौरभ
निदेशक भाषा विभाग पंजाब
भाषा भवन, पटियाला
खनन भारती
वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड
कोल स्टेट, सिविल लाइन्स
नागपुर-440001
माया इन्डिया
6/395 'माया हाउस'
मालवीय नगर
जयपुर-302017 (राज०)
e-mail- mayaindia2005@hotmail.com
संपादक / निदेशक
हरिगंधा
हरियाणा साहित्य अकादमी
कोठी नं० 169, सेक्टर-12
पंचकूला (हरियाणा)-134112
सम्यक्
संपादक- मदनमोहन उपेन्द्र
ए-10, शान्ति नगर (संजय नगर)
मथुरा- 281001(उ॰प्र॰)
मेकलसुता (दोहा विधा की पत्रिका)
संपादक- कृष्णस्वरूप शर्मा 'मैथिलेन्द्र'
गीतांजलि भवन, म॰आ॰व॰ 08
आवासीय मण्डल उपनिवेशिका
नर्मदापुरम् (होशंगाबाद)म॰प्र॰ 461001
सरल चेतना
संपादक- हेमन्त रिछारिया
कोठी बाजार, होशंगाबाद(म॰प्र॰)
भारतीय मनीषा
संपादक- डॉ॰ रमाकान्त श्रीवास्तव
एल॰ 6 \ 96 , अलीगंज,
लखनऊ (उ॰प्र॰)-226024
हाइकु दर्पण (हाइकु कविता की पत्रिका)
संपादक- डॉ॰ जगदीश व्योम
बी-74, केन्द्रीय विद्यालय
प्रतिभूति कागज कारखाना
होशंगाबाद (म॰प्र॰) 461005
आजकल
प्रकाशन विभाग
कमरा नं० 120
सूचना भवन, सी०ओ०जी० कॉम्पलेक्स
लोदी रोड, नई दिल्ली-110003
वर्तमान साहित्य
28- एम०आई०जी०
अवन्तिका-1
रामनगर रोड
अलीगढ़-202001(उ०प्र०)
