माया इण्डिया
इलैक्ट्रानिक प्रिंट मीडिया के इस दौर में एक और हिन्दी पत्रिका का पदार्पण विस्मय करने के लिए पर्याप्त है। लेकिन प्रवेशांक से अगस्त तक के अंकों ने इसकी वैचारिक पृष्ठभूमि, इसकी यथार्थता और वर्तमान में इसके औचित्य को स्वत: ही स्पष्ट कर दिया है।
व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा की दौड़ में कई पत्रिकाएँ अपने कलेवरों अपनी तथाकथित पाठ्य सामग्री/स्तम्भों/अश्लील चित्रों के माध्यम से बाजार में न केवल अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में कामयाब दिखती हैं बल्कि कुछ भीड़ भी अपने ईद-गिर्द जुटा ही लेती हैं, भले ही थोड़े समय के लिए ही सही। यह बात और है कि भीड़ जुटाने की मानसिकता मदारियों की होती है प्रबुद्धों की नहीं। ऐसी पत्रिकाएँ सफर समाप्ति के बाद या तो ट्रेन में ही छोड़ दी जाती हैं या कुछ समय यह बैडरूम में गद्दों के नीचे जगह पा जाती हैं। माया इण्डिया इस तामझाम से अछूती है इसके लिए यह धन्यवाद की पात्रता रखती है।
अपनी तरफ से ......... में श्री प्रताप सिंह की हिन्दी की दुर्दशा पर कई व्यथा केवल प्रबुद्ध वर्ग तक ही सीमित नहीं है, बल्कि आम जन मानस भी इस पीड़ा को लम्बे समय से महसूस कर रहा है। देखा जाये तो हम हिन्दी की दुर्दशा का रोना और अंग्रेजी भाषा का विरोध इन पखवाड़ों में कुछ ज्यादा ही करते हैं, जो ठीक नहीं है। मुझे याद है कि आतंकवाद के बढ़ते प्रसार पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए व्रिटेन की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती मारग्रेट थैचर ने कहा था- ''ऐसे विषयों पर अनावश्यक बहस ही इनके प्रचार-प्रसार में सहायक होती है।`` हिन्दी के गौरव को कायम रखना है तो हमें भाषा द्वेष और क्षेत्रीयता के सीमित दायरे से बाहर आना ही होगा। साथ ही इन पखवाड़ों पर हिन्दी की दुर्दशा पर रोने की प्रवृत्ति छोड़ सकारात्मक सोच पैदा करनी होगी।
'बरकरार है जादू` में शोभा ठाकुर ने बहुत ही अच्छे ढँग से हिन्दुस्तान की इस गौरव और मिथक बन चुकी स्वर सामाज्ञी लता मंगेशकर के कई अनछुए पहलुओं को सामने रखा है। लगता तो यही है कि ईश्वर अपनी इस इकलौती अनूठी कृति को दुहराना नहीं चाहता। लता की जितनी लोकप्रियता चालीस के दशक में थी उससे कहीं ज्यादा आज है।
'तस्वीरें बोलती हैं` की नयनाभिराम तस्वीरें अपनी सजीवता, सरलता और चित्र विन्यास के कारण हृदय पर अपना अलग ही प्रभाव छोड़ती है। 'अन्दाज़े वयां` की गज़लें भी दिल के किसी केने को अनायास ही गुदगुदा देती हैं। 'तिरछे तीर` में शरद जोशी का व्यंग्य हमारे व्यावसायिक जीवन सम्बंधों पर करारी चोट करता है। 'सिनेमा सिनेमा` स्तम्भ माया नगरी की वास्तविकता और वर्तमान प्रसंगों को बखूवी जागर करते हैं।
माया इण्डिया ने कुल मिलाकर अपने सर्वग्राही स्तम्भों के साथ एक अच्छी शुरुआत की है। यह सिलसिला आगे भी कायम रहेगा और पत्रिका पाठकों के बीच अपनी अमिट छवि बनाने में सफल होगी। आशा है हमारा यह विश्वास अक्षुण्ण रहेगा।
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-राजेश सिंह
लाइब्रेरियन
केन्द्रीय विद्यालय प्र.का.का.होशंगाबाद (म.प्र.)
-राजेश सिंह
लाइब्रेरियन
केन्द्रीय विद्यालय प्र.का.का.होशंगाबाद (म.प्र.)